वार्षिक · अगस्त–सितम्बर
इसे यह भी कहते हैं हरतालिका व्रत
कब रखा जाता है
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महत्त्व
हरतालिका तीज का व्रत विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख के लिए रखती हैं, और अविवाहित कन्याएँ शिव जैसा समर्पित पति पाने की कामना से रखती हैं। यह व्रत देवी पार्वती की उस तपस्या की स्मृति में रखा जाता है जिसके द्वारा उन्होंने शिव को पति रूप में प्राप्त किया था, और इसलिए यह वर्ष के सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है।
कथा
शिव पुराण के अनुसार, पार्वती के पिता हिमवान ने उनका विवाह विष्णु से तय करने का विचार किया, किन्तु पार्वती का हृदय शिव के लिए समर्पित था। उनकी सहेली ने पार्वती को वन में ले जाकर छिपा दिया — 'हर' (अपहरण) और 'आलिका' (सखी/महिला मित्र) से मिलकर इस व्रत का नाम बना — जहाँ पार्वती ने बिना अन्न और जल के कठोर तपस्या की, और अंततः शिव प्रकट हुए तथा उनसे विवाह करने पर सहमत हुए। भक्तजन उसी तपस्या की स्मृति में यह व्रत रखते हैं।
पूजा-विधि
पूरे भारत में
यह व्रत सर्वाधिक प्रचलित रूप से उत्तर भारत में — उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश — में मनाया जाता है, और अक्सर महिला रिश्तेदारों तथा सहेलियों के साथ मिलकर पूरे दिन सामूहिक रूप से रखा जाता है, न कि अकेले।
प्रश्न
'हर' का अर्थ अपहरण और 'आलिका' का अर्थ स्त्री सखा है — यह नाम उस घटना का स्मरण कराता है जब पार्वती की सहेली ने उन्हें वन में ले जाकर छिपाया, ताकि वे पिता द्वारा चुने गए वर के स्थान पर शिव से विवाह हेतु तप कर सकती सकें।
अनेक महिलाएँ पूर्व संध्या से ही बिना अन्न और जल का कठोर निर्जला व्रत रखती हैं; कुछ लोग इसे कम कठोर रूप में भी रखते हैं। इसे वर्ष के सर्वाधिक कठिन व्रतों में से एक माना जाता है।
यह हिन्दू पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पूर्व आती है (भाद्रपद शुक्ल तृतीया, चतुर्थी से एक दिन आगे), यद्यपि दोनों व्रत-त्योहारों का आपस में कोई अन्य धार्मिक संबंध नहीं है।
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